भजन के बारे में
रुक्मिणी हरण पर आधारित हरियाणवी कृष्ण भजन — गंगा नहाने गई रुक्मिणी कृष्ण की बांसुरी सुनकर मन हार बैठती है, शिशुपाल से ब्याह से मना करती है और मंदिर से निकलते ही कृष्ण उसे अपने रथ में बैठा ले जाते हैं।
कब गाया जाता है: जन्माष्टमी, कार्तिक मास और कृष्ण कीर्तन में।
मुखड़ा (Hinglish): Ganga nahaan gayi thi ae Rukman, ooth pahar ka tadka, he Krishna ji ki baaji baansuri mera kaalja dhadka.
भजन के बोल

गंगा नहान गई थी ऐ रुकमण ऊठ पहर का तड़का
हे कृष्ण जी की बाजी बासुरी मेरा कालजा धड़का।
कह दिए री माँ पिता मेरे नै-2।
कहिए ठोक बजा के हे कृष्ण गैलया ब्याह
करावाऊ मेरा कालजा धड़कै।
हे तु तो रै सुथरी घनी सै-2।
कृष्ण का रंग काला हे शिशुपाल गैलया ब्याह
करवाले कटै रुप का चाला।
हे शिशुपाल मेरे पावं की जुती-2।
के लागै मेरा साला हे कृष्ण गैलया ब्याह
करवाऊ भूरा हो चाहे काला।
हे मन्दिर मा तै रुकमण निकली-2।
अपना थाल सजाके हे आगे तै हो वो कृष्ण आ
गया अपना अर्थ सजा के।
हे मेरे अर्थ मै बैठ ले रुकमण-2।
तेरे लिए सजाया हे कृष्ण जी का संख बाज
रहा हुया नगरी मै उजियारा।
हे दर्शन करके प्रसन्न हो गए-2।
हृदय मे उजियारा हे पत्थर के मै दिया दिखाई
मोहन मुरली वाला।
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