भजन के बारे में

हरियाणवी लोकगीत, जिसमें खेत में काम करने वाली एक स्त्री का जीवन दिखाया गया है — दिन भर पूले काटकर घर लौटने पर कहासुनी होती है और फिर पति ही प्यार से चोट सेंकता और आँसू पोंछता है। यह गीत गाँव के जीवन और पति-पत्नी के रिश्ते के उतार-चढ़ाव की झलक देता है।

कब गाया जाता है: महिलाओं की गीत मंडली, तीज-त्योहार और शादी-ब्याह की महफ़िल में।

मुखड़ा (Hinglish): Hara suit meri kaali choti, bharma bharma chhaati, he aaj khet mai jaana hoga le haali ki roti he.

भजन के बोल

हरा सुट मेरी काली चोटी -2 भरमा भरमा छाती

 हे आज खेत मै जाना होगा ले हाली कि रोटी हे।

200 तो हे मैनै पूले काटे-2 जून रहा कोए बाकी 

हे काट कुट कै घरनै आई दई जले नै लाठी हे।

200 तो हे मेरै लाठी मारी -2 लात रहा कोए बाकी हे

मार मुर कै बुझनै लागा चोट कड़ै सी लागी हे।

पाली के मै आचं घाल के-2 मेरी पासु सेकन लागा हे

कांधे पर तै तार तोलिया आसुं पुछनै लागा हे।

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Categories: Geet

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