लेकर के खड़ी सीता जयमाला पहनाने को।

तड़पे उनका मनवा दुल्हन बन जाने को।

लेकर के खड़ी …।

छुते हि धनुष टुटा श्री राम से पल भर मे।

ये सुनके सिया आई सज धज के स्वयंवर मे।

खुद आई रघुवर से जयमाला पहनाने को।

लेकर के…।तड़पे …।

ऊचे सिंहासन पर बैठे थे राम जहाँ।

जिससे ना पहुंच पाए सीता के हाथ वहाँ।

जयमाला कि कलियाँ आई मुरझाने को।

लेकर के…।तड़पे…।

इस नारी पे भगवन थोड़ा उपकार करो।

थोड़ा सा झुक कर के माला स्वीकार करो।

संग कि सखियाँ आई रघुवर को मनाने को।

लेकर के…।तड़पे…।

श्री राम ने ये सोचा मै शक्तियां होकर के।

एक नारी से माला पहनुंगा झुक करके।

तैयार हुए ना वो सर अपना झुकाने को।

लेकर के…।तड़पे…।

फिर नैन इशारों मे सीता ने लखन से कहा।

पृथ्वी को उठा ले तु अपने फन पर ये वसुधा।

कितना बल है तुझमें आई अजमाने को।

लेकर के…।तड़पे…।

ये लखन तेरा मैया पृथ्वी जो उठाएगा।

तो सिंहासन उतना ऊचाँ उठ जाएगा।

मुझसे ना कहो माता पृथ्वी को उठाने को।

तड़पे…।

श्री लक्ष्मण रघुवर के चरणों मे जा बैठे।

श्री राम झुके थोड़ा तुम कहो लखन बेटे।

देरी न सिया ने कि जयमाला पहनाने की।

हर्षे उनका मनवा दुल्हन बन जाने से।

Categories: Ram bhajan

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