
भजन के बारे में
यह हरियाणवी लोक भजन नरसी भगत और उनकी बेटी हरनन्दी के भात की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। जब हरनन्दी के मायके से भात भरने वाला कोई नहीं था, तब स्वयं श्रीकृष्ण भात भरने पहुँचे और सिरसागढ़ में सोने-मोहरों, शाल-दुशालों और चुनरियों की वर्षा हुई।
कब गाया जाता है: शादी में भात भरने के समय, भात न्योतने पर और कृष्ण कीर्तन में।
मुखड़ा (Hinglish): Sone ki padai phuhaar phuhaar jab Krishna bhaat bharan laagya. Harnandi kai bhai konya, aur koi asnaai konya.
भजन के बोल
सोने की पड़ै फुहार फुहार जब कृष्ण
भात भरन लागया।
हरनन्दी कै भाई कोन्या।
और कोई असनाई कोन्या।
नरसी बना फकीर फकीर जब कृष्ण
भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
हरनन्दी रोवै बैठी बैठी।
नैनों से या नीर बहावै।
हरनन्दी घनी लाचार लाचार जब कृष्ण
भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
सिरसागढ का देख नजारा।
सिरसागढ मै हुआ चमत्कारा।
या दिन की बना दई रात हो रात जब
कृष्ण भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
सवा पहर बरसा मोहर अशरफी।
थम ठा लो नर और नार जब कृष्ण
भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
सवा पहर बरसा शाल दुशाला।
थम ठा लो ननद और सास हो सास
जब कृष्ण भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
सवा पहर या चुनरी बरसी।
थम ठा लो सारी बाहन
जब कृष्ण भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
समधन ठावै दौड़ दौड़ के।
समधी जी खड़ा हाथ जोड़ के।
हसं रहे कृष्ण मुरार मुरार जब कृष्ण
भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
हरनन्दी धोरै आए मुरारी।
म्हारी बाहन चलने की तैयारी।
इस भाई नै रखियो याद हो याद
जब कृष्ण भात भरन लागया।
सोने की पड़ै…।
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