
प्रभु कैसा खेल रचाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
तुने कैसे तो आकाश बनाया।
नहीं खम्भा एक लगाया है ये मेरी समझ नहीं आया।
प्रभु कैसा…।
तुने कैसे तो ये धरती बनाई।
कही रेत के टिब्बे पहाड़ बनाए।
कहीं सागर गहरा बनाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
तुने तरह-तरह के मानुष बनाए।
तु जीव कहा से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
तुने तरह-तरह के पेड बनाए।
तु बीज कहा से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…
तुने तरह-तरह के फूल बनाए।
तु खुशबू कहा से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
तुने सतरंगी ये दूनिया बनाई।
तु रंग कहाँ से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
तुने तरह-तरह के भोग बनाए।
तु स्वाद कहाँ से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
तुने अलग-अलग सब भाग्य बनाए।
तकदीर कहाँ से लाया है ये मेरी समझ नहीं आया है।
प्रभु कैसा…।
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