
पह्रलाद जी को लग गई हरि रटना।हरि रटना राम रटना।
पह्रलाद जी…।
जब पह्रलाद जी अग्नि मे डाला।शीतल रुप बनायो अपना।
पह्रलाद जी…।हरि रटना…।
पह्रलाद जी…।
जब पह्रलाद जी को सर्पों मे डाला। निर्मल रुप बनायो अपना।
पह्रलाद जी…। हरि रटना…।
पह्रलाद जी…।
जब पह्रलाद जी को नदी बिच डाला।मछली रुप बनायोअपना।
पह्रलाद जी…।हरि रटना…।
पह्रलाद जी…।
जब पह्रलाद जी को खम्बे बिच डाला।नरसिंह रुप बनायो अपना।
पह्रलाद जी…।हरि रटना…।
पह्रलाद जी…।
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